Author Archives: Piuly

Stillness

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The night a shade of pale charcoal was waiting for the approaching dawn. The moon still bright and nearly full was bathing the land with its gentle serene glow. The stillness of the hour hung like a shroud covering the land. The crickets had stopped chirping, the stray dogs lay curled up on the street, the crows and birds were still roosting. The cows alone were awake, they looked at me from across the fence with big wide-open eyes. The big docile bovines swung their tails and shook their heads ever so gently, as though afraid to break the stillness. The palm trees towering over my head and the coconut fronds peeking from behind the concrete pillars; all stood silently watching. A cool gentle breeze came wafting in my direction. Perhaps it had come from the nearby sea. It brushed the nearby Parijat tree and touched my face with that heavenly perfume of the delicate white flowers.

The ethereal fragrance of Parijat, the soft glowing moon, the dimly twinkling stars above, and the stillness of the land; together made the moment seem sublime. A sense of deep peace and pure joy welled up deep within me. I felt strangely connected to the moon, stars, trees, the land and the cows. As though the entire existence was a beautiful tapestry and we were all woven in that tapestry of existence with threads of stillness.

I glanced at the cows and they nodded their heads in silence as though they had read my thoughts and agreed with me.

 

 

 

 

 

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Drop of Water

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I am a drop of water that fell from the sky on the river of time. Flowing down the endless meandering river sometimes fast at times slow till I vaporise to join the sky. Some day I will come back again as another drop on the same river of time.

The roads are strewn with crimson and ochre petals. The last journey of the drop, Manikarnika beckons. The setting rays of the sun, the leaping flames of the pyre and the return to clay. Every chapter always ends the same way.

The hands of the flowing river of time will turn the page and a new chapter will begin again, a new story, a new play. But it will end the same way. Manikarnika knows and so does the setting sun.

Badra Baarish

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साँवली बदरा घिर आयी है आज

सुनकर तपती धरती की पुकार

घुंघराले उसके श्यामल केश

फैलें हैं आसमा के चारों शेष

 

बिजली सी कड़क है वो

पानी सी नरम है वो

भावुक हो के बरस जाएगी

सुरीली बूँदों में पिघल जाएगी

 

गीली सी भीगी सी आँखों के नमी सी

हवा में नाचती छेड़ मल्हार मधुर सी

कभी शाख़ों को डुलाती मनचलि सी

फिर खिड़की पे दस्तक देती अल्हड़ सी

 

कभी दबे क़दमों के टीप टीप से

कभी मूसलाधार के कोलाहल से

गरजती बरसती रिमझिम बौछाड

भिगोती डुबोती सराबोर ये संसार

Buddh Purnima

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रात है आज अनोखी चाँद है फ़लक पे पूरा

चाँदनी में भींगी हुई ना है कोई कोना अधूरा

इसी चाँद ने देखा था जब इन्सान बना था बुद्ध

यही था निर्वाक साक्षी जब हो गया वो पूर्ण शुद्ध

धरती गगन और तारें सभी हैं स्थिर ये रात

जैसे मुग्ध हैं स्मरण कर के बीती हुई वो बात

आज आई है फिर वो रात चाँद है फिर फ़लक पे पूरा

याद दिला रहा हमें जीवन का उदेश्ये अब भी है अधूरा

इस चाँद को फिर एक बार बनने दो साक्षी

अंदर के बुद्ध को जगाओ उड़ने दो जैसे उन्मुक्त पक्षी

पंक्तियां

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उगते हुए और ढलते हुए सूरज को देखा

टिमटिमाते हुए तारों को और जगमगाते हुए चाँद को देखा

शाखों पे फूल और डालों पे चिड़ियों को देखा

सीना ताने पहाड़ और सब्ज़ घाटिओं में उतरते बादलों को देखा

तुम्हे और तुम्हारे प्यार को मन के गेहरायों में देखा

ऐ खुदा हम ने इन सब में तुम्हे देखा

Kavita

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झाँक रही है भोर की स्निग्ध किरणे सफ़ेद परदों के पीछे से

आँखें मलते देख रहा हमे ये धुली किरणें अपने कुंचे से

 

मैं हूँ तुम्हारी बाँहों में बेलों जैसी लिपटी सी

आधी सोई आधी जागी किसी ख़्वाब में खोई सी

 

तुम अब भी हो निद्रा के घोर में

खोये हुए हो सपनो के किसी छोर में

 

तुम्हारी साँसे गरम सी धीमी सी

मेरी कानो को छूती रूहानी सी

 

तुम्हारा दिल लय में है धड़कता

मेरी पीठ से लग कर दिल तक है पहुँचता

 

तुम्हारी खुशबू मेरी सांसो को है महकाती

दिल के किसी गहराई में कोई राग है आलापति

 

हमारी उंगलिया एक दूसरे से है बंधे हुए

एक दूजे से न जाने किस जनम के नाते निभाते हुए

 

कितना सुकून है इस पल में

कितना आनंद है इस छण में

 

दिल करता है रोक लूँ समय को

बांध लू इन मधुर भावनाओं को

 

मुरझाने ना दूँ फिर इन्हे कभी

ढलने ना दूँ फिर इन्हे कभी

 

पर ये तो केवल मन की तरंगें हैं

ये पल भी बीत जायेगा यूँ ही

 

बस रह जाएगी तुम्हारे स्पर्शों की मीठी यादें

किसी किताब के पन्नो में क़ैद एक पुरानी गुलाब की आहें

Heem Pakshi

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Dekho ye zameen shwet se dhuli hui

Rui si barf mein simti dhaki hui

Kal raat ambar se barse the ye karn

Us chitrakar ne kar diya ye jahan shwet-varn

 

Ye heem pakshi aasman mein par phailayen hai ud rahe

Kahan hai kshitij kahan hai aasman sab ek jaise to lag rahe

Rukhi si ye zameen bejaan se ye ped

Gehri nidra mein hai jaise samay mein khoye hue

Intezar hai rashmi rathi ka

Gehre kohre se ushn kirnon ke jhakne ka

Ayega wo manzar bhi phir kabhi

Par ab vishram kar le ye mausam hai barfile sard ka