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Badra Baarish

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साँवली बदरा घिर आयी है आज

सुनकर तपती धरती की पुकार

घुंघराले उसके श्यामल केश

फैलें हैं आसमा के चारों शेष

 

बिजली सी कड़क है वो

पानी सी नरम है वो

भावुक हो के बरस जाएगी

सुरीली बूँदों में पिघल जाएगी

 

गीली सी भीगी सी आँखों के नमी सी

हवा में नाचती छेड़ मल्हार मधुर सी

कभी शाख़ों को डुलाती मनचलि सी

फिर खिड़की पे दस्तक देती अल्हड़ सी

 

कभी दबे क़दमों के टीप टीप से

कभी मूसलाधार के कोलाहल से

गरजती बरसती रिमझिम बौछाड

भिगोती डुबोती सराबोर ये संसार

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