Badra Baarish

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साँवली बदरा घिर आयी है आज

सुनकर तपती धरती की पुकार

घुंघराले उसके श्यामल केश

फैलें हैं आसमा के चारों शेष

 

बिजली सी कड़क है वो

पानी सी नरम है वो

भावुक हो के बरस जाएगी

सुरीली बूँदों में पिघल जाएगी

 

गीली सी भीगी सी आँखों के नमी सी

हवा में नाचती छेड़ मल्हार मधुर सी

कभी शाख़ों को डुलाती मनचलि सी

फिर खिड़की पे दस्तक देती अल्हड़ सी

 

कभी दबे क़दमों के टीप टीप से

कभी मूसलाधार के कोलाहल से

गरजती बरसती रिमझिम बौछाड

भिगोती डुबोती सराबोर ये संसार

Buddh Purnima

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रात है आज अनोखी चाँद है फ़लक पे पूरा

चाँदनी में भींगी हुई ना है कोई कोना अधूरा

इसी चाँद ने देखा था जब इन्सान बना था बुद्ध

यही था निर्वाक साक्षी जब हो गया वो पूर्ण शुद्ध

धरती गगन और तारें सभी हैं स्थिर ये रात

जैसे मुग्ध हैं स्मरण कर के बीती हुई वो बात

आज आई है फिर वो रात चाँद है फिर फ़लक पे पूरा

याद दिला रहा हमें जीवन का उदेश्ये अब भी है अधूरा

इस चाँद को फिर एक बार बनने दो साक्षी

अंदर के बुद्ध को जगाओ उड़ने दो जैसे उन्मुक्त पक्षी

पंक्तियां

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उगते हुए और ढलते हुए सूरज को देखा

टिमटिमाते हुए तारों को और जगमगाते हुए चाँद को देखा

शाखों पे फूल और डालों पे चिड़ियों को देखा

सीना ताने पहाड़ और सब्ज़ घाटिओं में उतरते बादलों को देखा

तुम्हे और तुम्हारे प्यार को मन के गेहरायों में देखा

ऐ खुदा हम ने इन सब में तुम्हे देखा

Kavita

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झाँक रही है भोर की स्निग्ध किरणे सफ़ेद परदों के पीछे से

आँखें मलते देख रहा हमे ये धुली किरणें अपने कुंचे से

 

मैं हूँ तुम्हारी बाँहों में बेलों जैसी लिपटी सी

आधी सोई आधी जागी किसी ख़्वाब में खोई सी

 

तुम अब भी हो निद्रा के घोर में

खोये हुए हो सपनो के किसी छोर में

 

तुम्हारी साँसे गरम सी धीमी सी

मेरी कानो को छूती रूहानी सी

 

तुम्हारा दिल लय में है धड़कता

मेरी पीठ से लग कर दिल तक है पहुँचता

 

तुम्हारी खुशबू मेरी सांसो को है महकाती

दिल के किसी गहराई में कोई राग है आलापति

 

हमारी उंगलिया एक दूसरे से है बंधे हुए

एक दूजे से न जाने किस जनम के नाते निभाते हुए

 

कितना सुकून है इस पल में

कितना आनंद है इस छण में

 

दिल करता है रोक लूँ समय को

बांध लू इन मधुर भावनाओं को

 

मुरझाने ना दूँ फिर इन्हे कभी

ढलने ना दूँ फिर इन्हे कभी

 

पर ये तो केवल मन की तरंगें हैं

ये पल भी बीत जायेगा यूँ ही

 

बस रह जाएगी तुम्हारे स्पर्शों की मीठी यादें

किसी किताब के पन्नो में क़ैद एक पुरानी गुलाब की आहें

Heem Pakshi

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Dekho ye zameen shwet se dhuli hui

Rui si barf mein simti dhaki hui

Kal raat ambar se barse the ye karn

Us chitrakar ne kar diya ye jahan shwet-varn

 

Ye heem pakshi aasman mein par phailayen hai ud rahe

Kahan hai kshitij kahan hai aasman sab ek jaise to lag rahe

Rukhi si ye zameen bejaan se ye ped

Gehri nidra mein hai jaise samay mein khoye hue

Intezar hai rashmi rathi ka

Gehre kohre se ushn kirnon ke jhakne ka

Ayega wo manzar bhi phir kabhi

Par ab vishram kar le ye mausam hai barfile sard ka

Shaam

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Shaam tumhare lalat pe nisha ka basera hai

keshon mein uljha suraj ka surkh hai

Godhuli ke dhul se range ho tum

Tumsa manoram na koi duja hai

 

Rome rome mein basa anant sthirta hai tumhare

Jaise prakriti tham gayi hai aane se tumhare

Chanchal din chala ja raha hai saunp ke apni sari kahani tumhare

Klant bhumi bhi basna chahti hai nirmal bahon mein tumhare

 

Sangam ho tum raat aur din ka

Pratibimb ho tum humare chaitanya ka

Tumhe dekhe ke anubhav hota hai jivan ek maya hai

Tumhare adhron se jhalakta amrit mujhe paana hai

 

Chan bhar ka hai astitva tumhara

Raat ke kajal mein yun hi vileen ho jate to tum

Bus chor jate ho maan mein ek adbhut aanand

Aur phir se chahat tumhe paane ka

Chahat

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Kaun ho tum, tumhe kya naam doon?

Chahat ya mohabbat kahoon ya gumnaam hi rahne doon

 

Tumhari ek soch dil mein khalbali macha deti hai

Tumhari ek jhalak dil ki har pyas mita deti ha

 

Tumhari Meera hoon ya Radha ye to mein nahi janti

Bus tumse bepanha ishq hai riston ko mein nahi maanti

 

Tumhare mulayam honth, tumhari khoosboo, tumhari awaz,

Tumhara astitwa hai is pyar ka aaghaz

 

Anjam kya hoga ye to waqt hi jaane

Chahat ke gehrayiyon mein rahoge sada mera dil bus yahi maane

 

Guzharish hai khuda se tumhe rakhe aabad

Tumhari khushi ki dua mangega ye dil hokar bhi barbaad